आलौकिक संपूर्ण फलदाई मासिक हवन यज्ञ 27 सितंबर 2026 रविवार को
जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में मां बगलामुखी जी के निमित्त सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान सुखमन सैनी एवं शीतल सैनी से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम में आयोजित दिव्य हवन यज्ञ के दौरान यज्ञ कुंड में प्रज्वलित पावन अग्नि की लौ मानो पूरे वातावरण को आध्यात्मिक प्रकाश से भर रही थी। मंत्रों की गूंज, हवन की सुगंध और श्रद्धा से जुड़े भक्तों के बीच धाम के पीठ उपासक नवजीत भारद्वाज ने संत सूरदास जी के भावपूर्ण दोहे के माध्यम से प्रभु प्रेम और भक्ति की व्याख्या करते हुए कहा कि
‘‘दीपक पीर न जानई, पावक परत पतंग। तनु तो तिहि ज्वाला जरयो, चित न भयो रस भंग॥’’
नवजीत भारद्वाज ने कहा कि संत सूरदास जी ने इस दोहे में दीपक और पतंगे के माध्यम से प्रेम की उस अवस्था का वर्णन किया है, जहां भक्त को अपने आराध्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। पतंगा दीपक की लौ को देखकर उसकी ओर खिंचा चला जाता है। उसे मालूम है कि उस लौ में उसका शरीर जल सकता है, फिर भी उसके कदम पीछे नहीं हटते।
यहां पतंगा केवल एक जीव नहीं है, बल्कि समर्पित भक्त का प्रतीक है और दीपक की लौ उस परम शक्ति का प्रतीक है, जिसके प्रेम में सच्चा साधक अपना अहंकार, अपनी चिंताएं और अपने सांसारिक मोह धीरे-धीरे समर्पित कर देता है।
उन्होंने कहा कि दोहे की दूसरी पंक्ति, *‘‘तनु तो तिहि ज्वाला जरयो, चित न भयो रस भंग॥’’* हमें भक्ति का अत्यंत गहरा रहस्य समझाती है। शरीर कठिनाइयों से गुजर सकता है, जीवन में दुख और संघर्ष आ सकते हैं, परिस्थितियां मनुष्य की परीक्षा ले सकती हैं, लेकिन सच्चे भक्त के मन में प्रभु के प्रति विश्वास की ज्योति कभी बुझनी नहीं चाहिए।
नवजीत भारद्वाज ने कहा कि सच्ची भक्ति हमें परिस्थितियों से भागना नहीं सिखाती, बल्कि परिस्थितियों के बीच खड़े होकर प्रभु पर भरोसा करना सिखाती है। जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी अपनी सुंदरता नहीं खोता, वैसे ही सच्चा भक्त संसार में रहते हुए भी अपने मन को प्रभु के चरणों में लगाए रखता है।
उन्होंने कहा कि मंदिर जाना, हवन करना, मंत्र जाप करना, आरती करना और पूजा-पाठ करना भक्ति के साधन हैं; लेकिन भक्ति की असली परीक्षा हमारे व्यवहार में होती है। यदि मंदिर से लौटने के बाद हमारे भीतर अहंकार बढ़ जाए, यदि मंत्र जाप के बाद भी हमारी वाणी किसी के हृदय को दुखाए, यदि हवन की अग्नि के सामने बैठने के बाद भी मन में द्वेष जलता रहे, यदि भगवान के सामने सिर झुकाएं लेकिन माता-पिता के सामने हमारा अहंकार खड़ा रहे, यदि हम जरूरतमंद को देखकर मुंह फेर लें तो हमें एक बार बाहर नहीं, अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है।
नवजीत भारद्वाज जी ने माँ भक्तों से कहा कि जब भी हवन कुंड में अग्नि की लौ दिखे उसमें केवल लकड़ी और आहुति जलती हुई न देखें। उस अग्नि में अपने भीतर का अहंकार अर्पित करें, क्रोध अर्पित करें, ईष्र्या अर्पित करें, भय अर्पित करें और अपनी चिंताएं मां के चरणों में समर्पित कर दें। क्योंकि हवन की सबसे सुंदर आहुति वह है, जिसमें सामग्री के साथ-साथ मनुष्य अपना अहंकार भी अर्पित कर दे।
प्रवचन के अंत में उन्होंने कहा कि *पतंगा दीपक की लौ में स्वयं को खो देता है। उसी प्रकार जब भक्त प्रभु प्रेम में डूबता है तो धीरे-धीरे उसके भीतर का ‘‘मैं’’ छोटा होने लगता है और ‘‘तू ही तू’’ का भाव बढऩे लगता है।
इस अवसर पर अमरेंद्र कुमार शर्मा,समीर कपूर, राकेश प्रभाकर,पूनम प्रभाकर ,सरोज बाला,प्रदीप , दिनेश सेठ,रोहित भाटिया,जानू थापर,नरेश,कोमल,वेद प्रकाश, मुनीष मैहरा, जगदीश डोगरा, ऋषभ कालिया,रिंकू सैनी, कमलजीत,बलजिंदर सिंह,धर्मपालसिंह, अमरजीत सिंह, उदय ,अजीत कुमार , नरेंद्र,राकेश शर्मा, अमरेंद्र सिंह, सुधीर, सुमीत, मनीष शर्मा, डॉ गुप्ता,अवतार सैनी, परमजीत सिंह, दानिश, रितु, कुमार,गौरी केतन शर्मा,सौरभ ,शंकर, संदीप,रिंकू,प्रदीप वर्मा, गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,दीपक , किशोर,प्रदीप , प्रवीण,राजू,संजीव शर्मा,अमनदीप शर्मा, गुरप्रीत सिंह, विरेंद्र सिंह, अमन शर्मा, ऐडवोकेट शर्मा,वरुण, नितिश,रोमी,दीलीप, लवली, लक्की, मोहित , विशाल , अश्विनी शर्मा , रवि भल्ला,जगदीश, नवीन कुमार, निर्मल,अनिल,सागर,दसोंधा सिंह, प्रिंस कुमार, पप्पू ठाकुर,सौरभ, नरेश,दिक्षित, अनिल, कमल, अजय सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
हवन यज्ञ उपरांत विशाल लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।
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